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आज फिर वही दिन; फिर वही बात है

जज्बे और जूनून की अरमानों से मुलाकात है ।

आज फिर तिरंगा गर्व से हवा में लहराएगा

हर बच्चा प्रफुल्लित हो राष्ट्रगान फिर गाएगा।

फिर निकलेगी मतवालों की टोली; राजपथ मुस्काएगा;

कला संस्कृति के प्रदर्शन से हर राज्य आज इठलाएगा।

आज फिर बलखेगी अमर जवान याद कर परवानों को ;

होंगी आँखें फिर नम याद कर उन बलिदानों को।

पर फिर आएगी रात नए दिन का आगमन होगा

शहीदों की कुर्बानी का पुनः जब विस्मरण होगा।

दैनिक कोलाहल के बीच कहीं गौरवान्वित भारत खो जायेगा

आज का प्रगतिशील भारत मानवता को भुलायेगा।

फिर दब जाएगी वह करुण चीख गाड़ियों के शोर-शराबे में;

और इसी तरह फिर चढ़ेगी भेंट नारी पौरुष के उग्र प्रदर्शन में।

फिर भी विषाक्त होगी गंगा कल कारखानों के दूषण से;

फिर भी दौड़ेगी फाइलें यहाँ नोटों के ही पोषण से।

फिर भी लहराएगा तिरंगा; पर न उसमें गौरव होगा;

फिर भी गाएगी हवा यहाँ; पर उसका राग भैरव होगा।

समस्याएं होंगी अनगिनत; फिर भी हम उन्ही पे इतरायेंगे ;

गण होंगे पर तंत्र न होगा; फिर भी हम गणतांत्रिक कहलायेंगे।