Mahabharat

कठिन समय है. श्यामल बादल फिर आकाश में छाये;
उग्र वेग से पवन है बहता, सूरज दीख न पाये |
घोर ध्वनि में गर्जन करते, मेघ धरती को घेरे;
अनंत निशा में डूबी पृथ्वी, खो गए हैं सवेरे |

पर है यह संकेत कि निकट भविष्य में, भीषण युद्ध निश्चित है;
घोर तिमिर पर अखंड प्रकाश की, विजय पुनः निश्चित है |
रक्त की प्यासी काली माँ का, उन्मत्त नर्तन निश्चित है;
दानव-दल-वध करने दुर्गा का अवतरण निश्चित है |

तो हो जाए यह अंतिम रण,
जिसमें करने जीवन अर्पण;
हैं वीर खड़े उकसाए से,
न किंचित भी घबराये से |

फिर गांडीव की हो टंकार.
फिर पाञ्चजन्य की हो हुंकार;
फिर से सुन शत्रु की ललकार,
उबल उठे फिर रक्त की धार |

तीरों से तीर फिर टकराएं,
खडग-त्रिशूल फिर लड़ जाएँ;
पौरुष का ऐसा प्रदर्शन हो,
कि काल एक पल को थम जाए |

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