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Hindi

काल एक पल को थम जाए


Mahabharat

कठिन समय है. श्यामल बादल फिर आकाश में छाये;
उग्र वेग से पवन है बहता, सूरज दीख न पाये |
घोर ध्वनि में गर्जन करते, मेघ धरती को घेरे;
अनंत निशा में डूबी पृथ्वी, खो गए हैं सवेरे |

पर है यह संकेत कि निकट भविष्य में, भीषण युद्ध निश्चित है;
घोर तिमिर पर अखंड प्रकाश की, विजय पुनः निश्चित है |
रक्त की प्यासी काली माँ का, उन्मत्त नर्तन निश्चित है;
दानव-दल-वध करने दुर्गा का अवतरण निश्चित है |

तो हो जाए यह अंतिम रण,
जिसमें करने जीवन अर्पण;
हैं वीर खड़े उकसाए से,
न किंचित भी घबराये से |

फिर गांडीव की हो टंकार.
फिर पाञ्चजन्य की हो हुंकार;
फिर से सुन शत्रु की ललकार,
उबल उठे फिर रक्त की धार |

तीरों से तीर फिर टकराएं,
खडग-त्रिशूल फिर लड़ जाएँ;
पौरुष का ऐसा प्रदर्शन हो,
कि काल एक पल को थम जाए |

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खूनी हस्ताक्षर


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In memory of the great man who created an army to free his motherland…

The very famous (and one my favorite) poem by Gopal Prasad Vyas…

Happy Birthday… dear son of India…

वह खून कहो किस मतलब का
जिसमें उबाल का नाम नहीं।
वह खून कहो किस मतलब का
आ सके देश के काम नहीं।

वह खून कहो किस मतलब का
जिसमें जीवन, न रवानी है!
जो परवश होकर बहता है,
वह खून नहीं, पानी है!

उस दिन लोगों ने सही-सही
खून की कीमत पहचानी थी।
जिस दिन सुभाष ने बर्मा में
मॉंगी उनसे कुरबानी थी।

बोले, “स्वतंत्रता की खातिर
बलिदान तुम्हें करना होगा।
तुम बहुत जी चुके जग में,
लेकिन आगे मरना होगा।

आज़ादी के चरणें में जो,
जयमाल चढ़ाई जाएगी।
वह सुनो, तुम्हारे शीशों के
फूलों से गूँथी जाएगी।

आजादी का संग्राम कहीं
पैसे पर खेला जाता है?
यह शीश कटाने का सौदा
नंगे सर झेला जाता है”

यूँ कहते-कहते वक्ता की
आंखों में खून उतर आया!
मुख रक्त-वर्ण हो दमक उठा
दमकी उनकी रक्तिम काया!

आजानु-बाहु ऊँची करके,
वे बोले, “रक्त मुझे देना।
इसके बदले भारत की
आज़ादी तुम मुझसे लेना।”

हो गई सभा में उथल-पुथल,
सीने में दिल न समाते थे।
स्वर इनकलाब के नारों के
कोसों तक छाए जाते थे।

“हम देंगे-देंगे खून”
शब्द बस यही सुनाई देते थे।
रण में जाने को युवक खड़े
तैयार दिखाई देते थे।

बोले सुभाष, “इस तरह नहीं,
बातों से मतलब सरता है।
लो, यह कागज़, है कौन यहॉं
आकर हस्ताक्षर करता है?

इसको भरनेवाले जन को
सर्वस्व-समर्पण काना है।
अपना तन-मन-धन-जन-जीवन
माता को अर्पण करना है।

पर यह साधारण पत्र नहीं,
आज़ादी का परवाना है।
इस पर तुमको अपने तन का
कुछ उज्जवल रक्त गिराना है!

वह आगे आए जिसके तन में
खून भारतीय बहता हो।
वह आगे आए जो अपने को
हिंदुस्तानी कहता हो!

वह आगे आए, जो इस पर
खूनी हस्ताक्षर करता हो!
मैं कफ़न बढ़ाता हूँ, आए
जो इसको हँसकर लेता हो!”

सारी जनता हुंकार उठी-
हम आते हैं, हम आते हैं!
माता के चरणों में यह लो,
हम अपना रक्त चढाते हैं!

साहस से बढ़े युबक उस दिन,
देखा, बढ़ते ही आते थे!
चाकू-छुरी कटारियों से,
वे अपना रक्त गिराते थे!

फिर उस रक्त की स्याही में,
वे अपनी कलम डुबाते थे!
आज़ादी के परवाने पर
हस्ताक्षर करते जाते थे!

उस दिन तारों ने देखा था
हिंदुस्तानी विश्वास नया।
जब लिक्खा महा रणवीरों ने
ख़ूँ से अपना इतिहास नया।

निज-साक्षात्कार | Self- Introspection


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A journey of self-realization… as a extension of मैं कौन हूँ?

English translation follows Hindi…

 

मंद-मंद बहता पवन हूँ
मंद-मंद सुगन्धित उपवन हूँ
मैं माटी की सौंधी खुश्बू हूँ
इस ब्रह्माण्ड का अलौकिक जादू हूँ

अंजाना सा एक स्पर्श हूँ मैं
हृदयांतर का अद्भुत हर्ष हूँ मैं
अदृश्य मूक श्रोता हूँ मैं
अनकहे शब्दों का वक्ता हूँ मैं

बारिश में छिपी अश्रुधार हूँ मैं
अधूरा अव्यक्त प्यार हूँ मैं
सूखे फूलों की महक हूँ मैं
कैद पक्षी की चहक हूँ मैं

नन्हे शिशु की मुस्कान हूँ मैं
स्वच्छंद पक्षी की उड़ान हूँ मैं
एक अथक-निरंतर प्रयास हूँ मैं
धावक की अंतिम श्वास हूँ मैं

मैं असीम अपरिमित अशेष उल्लास
मैं अनंत अचल सनातन आस
मदमस्त होकर नाचने वाला मैं पागलपन
निश्चिन्त निर्विघ्न निर्विकार बचपन

मैं कभी लघु तो कभी विराट
मैं कभी भिक्षुक तो कभी सम्राट
मैं हूँ कठोर, मैं हूँ कोमल
मैं ही श्वेत, मैं ही श्यामल

मैं वीरों की ख्याति हूँ
मैं अग्नि हूँ, मैं ज्वाला हूँ
मैं माता की ममता हूँ
मैं प्रेम प्रसंग निराला हूँ

मैं वह ललाट हूँ जिसपर सूरज ने स्वयं तिलक किया है
मैं वह कंठ हूँ जिसने स्वयं अमृत-सुधा पिया है
श्रावण की पावन वृष्टि का मैं एक जल-बिंदु हूँ
पर अवतरित हो धरती पर, मैं असीम एक सिंधु हूँ

मैं ही श्रुति, हैं ही स्मृति
मैं ही रचना, मैं ही कृति
मैं समष्टियों का वृहत समाहार
मैं ही श्रृष्टि, स्थिति और संहार

मैं उस निराकार का स्वरुप अपार
मैं नर से नारायण का साक्षात्कार
मेरा पिंड ब्रम्हांड का दर्पण
मेरा सर्वस्व प्रभु तुझको अर्पण

शून्य ही मेरी जननी है, शून्य ही मेरा परम ध्येय
शून्य से शून्य के इस पथ का मैं पथिक, मैं अज्ञेय

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Seamlessly flowing mild breeze

A subtly fragrant beautiful garden

I am the fragrance of the wet soil

I am the divine magic of this world

 

A seemingly unknown touch

A strange delight in heart’s core

An utterly silent spectator am I

An Orator of unsaid words am I

 

I am a tear hidden in rain

I am an incomplete, unexpressed love

I am the aroma of a flower withered away

I am the call of a bird trapped in a cage

 

The smile of a new-born

The flight of a free bird

The never-ending, unfailing trial I am

The very last breath of a sprinter I am

 

The unbounded, infinite, unending joy I am

The steady, unaltered, never-dying hope I am

I am the crazily dancing, uncaring madness

I am the carefree, limitless, unstoppable childhood

 

I am the small and the big

I am the beggar and the king

I am the stiff and the soft

I am the dark and the bright

 

I am the pride of the valliant

I am the fire of the flame

I am the love of the mother

I am the love of the love-story

 

I am the one blessed by the sun

I am the one who has drunk the divine wine

I am the tiny drop of the rain

I am the giant sea that does not refrain

 

I am the first scripture of the world

I am the creative and the creation

I am the collection of all collections

I am the creation, preservation and the end

 

I am the form of the formless

Conjunction of the man with the god

I am the mirror of the entire universe

And hence O lord! Everything mine is yours

 

Void is my creator, void is my goal

And in this journey from void to void, I am the traveller, the un-knowable…

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I tried to the best of my ability to translate, but admittedly the translation is not as polished as it should be… Any reader is welcome to give suggestions for improvement…

मैं कौन हूँ?


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जो कभी न बुझने पाए, उस दावानल की आग हूँ मैं
जो गीत त्याग के गाए, संगीत का वो राग हूँ मैं
उफनते सागर में उठते, लहरों की हुंकार हूँ मैं
जो हर रण में सदा गूंजी है, वीरों की ललकार हूँ मैं

विजय का उद्घोष करता, पाञ्चजन्य का नाद हूँ मैं
अग्नि जिसे न जला सकी, वह विष्णु-भक्त प्रह्लाद हूँ मैं
क्रोध में नाचते प्रलयंकारी शिव का तांडव नृत्य हूँ मैं
जो कभी न विस्मृत हो सके, वैसा ही अस्तित्त्व हूँ मैं

करुण-प्रताड़ित कंठों की, पीड़ित आवाज़ हूँ मैं
जो अन्याय का नाश करे, उस युद्ध का आगाज़ हूँ मैं
हर वीर के रगों में दौड़ती, ऊष्ण रक्त की धार हूँ मैं
शत्रु के प्राणों को हर ले, वह अंतिम प्रहार हूँ मैं

दुस्साशन की जांघें तोड़े, वह भीम की गदा हूँ मैं
एक अथक प्रहरी के भांति, सजग खड़ा सदा हूँ मैं
जहां वीरों के दल सजते हैं, वह पावन समरक्षेत्र हूँ मैं
धर्म-अधर्म का क्रीड़ाक्षेत्र, धर्मक्षेत्र-कुरुक्षेत्र हूँ मैं

एक दिन तुम आओगे | You would come one day


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This poem is written in Hindi. For those of you who don’t understand the language; I have translated it in English below. Please don’t use Google to translate the page… It does a pathetic job. Sorry that I could not maintain a good flow in the translated version…

ज्ञात है कि एक दिन तुम आओगे
अपने आलिंगन में ले जाओगे
सहसा कदाचित प्रकट होगे
और सुख-दुःख मेरा हर लोगे

निराकार अदृश्य हो तुम
असीम सर्वव्याप्त हो तुम
अचल अडिग नित्य हो तुम
जीवन का अंतिम सत्य हो तुम

हर ख़ुशी की मुस्कान हो तुम
हर दुःख की अश्रुधार हो तुम
अक्षुण्ण निर्विकार हो तुम
जीवन के मूलाधार हो तुम

लोग कहते हैं बड़े क्रूर हो तुम
अनासक्त; भावनाओं से दूर हो तुम
खुशियों के नाशक हो तुम
प्रचंड तेजस्वी विनाशक हो तुम

पर हे सुख-दुःख के मूलाधार!
अदृश्य अज्ञात विश्वाधार
तुम ही तो लेकर स्वरुप अपार
करते जीवन में जीवन-संचार

 

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I know you would come someday

Embrace me and take me away

Out of the blue you would appear

And take away my joys and fears

 

Invisible; formless you are

Ubiquitous; endless you are

Firm, immovable, immutable you are

The truth of life; undeniable you are

 

Smiles of all joys you are

Tears of all cries you are

Unimpaired; flawless you are

The basis of existence you are

 

They say cruel; brutal you are

Detached; stone-hearted you are

Murder of smiles you are

Fierce, ruthless destroyer you are

 

But O you! The pivot of peace and strife

Unknown, invisible, basis of life

Is it not you, who in the greatest form

Is the reason of life in all life-forms

Come to Form; O Formless!


Image

O one who gives the sun its glow
O one who makes the rivers flow
In whose praise the seas do roar
Come to form; O Formless!
With a mighty uproar

O one who flows in veins as life
O one who holds us through war and strife
The creator of smile on a warrior’s face
Come to form; O Formless!
And the world you do embrace

O one who is spread on the lands so vast
O one who flutters the flags on masts
On rhythms of whom life does flow
Come to form; O Formless!
With your majestic glow

O one who transforms the sweat into grains
O one who showers new life as rains
On whose arrival the earth does smile
Come to form; O Formless!
It has been a long while…

 

One of the biggest Indian festivals – Durga Puja (Navratri) – is knocking on the door. And this poem calls upon the omnipresent Goddess Durga to take form and reside in our hearts. Happy Navratri to all of you.

 

This poem was originally written in Hindi. I then translated it to English. I tried to keep the essence intact and not the exact meaning. Here is the original poem in Hindi.

सूरज बन धधक रही जिसकी ज्वाला 

नदियों की जो उज्जवल धारा 
भर रही जो सागर में हुंकार 
समाहित है जिसमें सारा संसार 
साकार रूप में अवतरित हो; हे माँ निराकार!
 
शरीर में बन रक्तिम धार 
कर रही जो नव-जीवन संचार 
मन में ले  ढाँढस का अवतार 
प्रसारित कर ज्योति अपरम्पार 
साकार रूप में अवतरित हो; हे माँ निराकार!
 
जिसके लय पर थिरके जीवन 
ताल पे जिसके नाचे सावन 
विस्तार है जिसका अनंत अपार 
उद्घोषित कर प्रचंड रण-हुंकार 
साकार रूप में अवतरित हो; हे माँ निराकार!
 
सुगन्धित कर दो वन-उपवन 
बरसाकर निज-आशीष पावन 
देखो भक्तों की भीड़ अपार 
प्रतीक्षा करता सारा संसार 
साकार रूप में अवतरित हो; हे माँ निराकार!
 
And here is its Anglicized version… (for those who can’t read the Hindi script) …
 

Suraj ban dhadhak rahi jiski jwala
Nadiyon ki jo ujjwal dhaaraa
Bhar rahi jo saagar mein hunkaar
Samaahit hai jismein samast sansaar
Saakaar roop mein awtarit ho; he ma nirakaar!

Sharir mein ban raktim dhaar
Kar rahi jo nav jeewan sanchaar
Man mein le dhaandhas ka awtaar
Prasarit kar jyoti aparampaar
Saakaar roop mein awtarit ho; he ma nirakaar!

Jiske laya par thirke jeewan
Taal pe jiske naache saawan
Vistaar hai jiska anant apaar
Udghoshit kar prachand ran hunkaar
Saakaar roop mein awtarit ho; he ma nirakaar!

Sugandhit kar har van upvan
Barsakar nij aashish paawan
Dekho ma bhakton ki bheed apaar
Prateeksha karta saara sansaar
Saakaar roop mein awtarit ho; he ma nirakaar!

Just in case you are curious: The verse (shloka) in the image is in Sanskrit which translates (roughly)to…
The one who is present in all forms; in all beings and has all the powers…
One who removes all fears; We bow to that Goddess Durga…

आज फिर


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आज फिर वही दिन; फिर वही बात है

जज्बे और जूनून की अरमानों से मुलाकात है ।

आज फिर तिरंगा गर्व से हवा में लहराएगा

हर बच्चा प्रफुल्लित हो राष्ट्रगान फिर गाएगा।

फिर निकलेगी मतवालों की टोली; राजपथ मुस्काएगा;

कला संस्कृति के प्रदर्शन से हर राज्य आज इठलाएगा।

आज फिर बलखेगी अमर जवान याद कर परवानों को ;

होंगी आँखें फिर नम याद कर उन बलिदानों को।

पर फिर आएगी रात नए दिन का आगमन होगा

शहीदों की कुर्बानी का पुनः जब विस्मरण होगा।

दैनिक कोलाहल के बीच कहीं गौरवान्वित भारत खो जायेगा

आज का प्रगतिशील भारत मानवता को भुलायेगा।

फिर दब जाएगी वह करुण चीख गाड़ियों के शोर-शराबे में;

और इसी तरह फिर चढ़ेगी भेंट नारी पौरुष के उग्र प्रदर्शन में।

फिर भी विषाक्त होगी गंगा कल कारखानों के दूषण से;

फिर भी दौड़ेगी फाइलें यहाँ नोटों के ही पोषण से।

फिर भी लहराएगा तिरंगा; पर न उसमें गौरव होगा;

फिर भी गाएगी हवा यहाँ; पर उसका राग भैरव होगा।

समस्याएं होंगी अनगिनत; फिर भी हम उन्ही पे इतरायेंगे ;

गण होंगे पर तंत्र न होगा; फिर भी हम गणतांत्रिक कहलायेंगे।

मन


This one is in Hindi (poetic feelings always show up only in mother tongue :P)

कभी कठिनाइओं  के बीच अडिग-अचल
तो कभी चिंताओं की चहल-पहल|

भावनाओं के लहरो में बहती जाए इसकी नैया
कभी  मामा कंस तो कभी श्रीकृष्ण खिवैया;
पल में क्रोध-परिपूर्ण तो पल में स्नेह का आलिंगन
झूठ और सच्चाई के अंतर्द्वंद्व का यह क्रीडांगन|
श्रीकृष्ण के कृत्यो की कीर्ति कर्न्य कर कृतार्थ हुआ;
पर पग-पग पे बाधा देख प्रण-पथ से यह विचलित हुआ|
द्रुतगामी है, दिक्-भामित है, तो कभी दंभ का दर्पण है;
कभी जल-चन्द्र-प्रतिबिम्ब-सम विचलित होकर भी सौम्य है|
काश यह मन भी कदाचित चंचल न इतना होता
पर फिर शायद इस देह का जीवन, जीवन न होता|

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