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Patriotism

अपनी माटी


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जहाँ सूर्य की पहली किरण से
हर सवेरा अपनी माँग सजाता;
जहाँ अनंत नील गगन
असीम समुद्र में लय हो जाता;
जहाँ लहराते हरे खेतों पर
स्वर्णिम सरसों मुकुट चढ़ाती;
सब रंगों से सजी हुई
सतरंगी है वह अपनी माटी।

जहाँ ईश्वर को साथ पुकारें
मस्जिद की अजान मंदिर की घंटी;
जहाँ प्रभात का स्वागत करती
कोयल की वह मधुर बोली;
जहाँ आज भी रास रचाती
राधा की पायल कान्हे की बंसी;
अमर रागों को सुनती-गाती
सुरीली है वह अपनी माटी।

आज वही सूरज वही गगन
वही कोयल है पुनः पुकारती;
दिल में लाखों प्रश्न लिए
आर्य-पुत्र को है ललकारती।
गीत शौर्य का गाते हुए
बलिदानों की याद दिलाती
महापुरुषों ने देखा जो सपना
वही स्वप्न है पुनः दिखाती

बहुत कुछ है पाया; बहुत कुछ है पाना
लम्बे कठिन इस मार्ग पे तुम कहीं थक न जाना।
मार्ग कठिन है; देखो देश कहीं भटक न जाए
कीचड़ से कली फूटी है; बिन खिले सूख जाए।

Happy Republic Day to all Indians… 🙂

Translation is not possible (yet again)… However, I present the Roman transliteration for some of my dear readers…

Jahaan surya ki pratham kiran se
Har sawera apni maang sawaarta
Jahan anant neel gagan
Aseem samudra mein lay ho jaataa
Jahaan lehraate hare kheton par
Swarnim sarson mukut chadhaati
Sab rangon se saji hui
Sanrangi hai wah apni dharti

Jahaan prabhaat ka swaagat karti
Koyal ki wah madhur boli
Jahaan ishwar ko saath pukaaren
Masjid ki ajaan, mandir ki ghanti
Jahaan aaj bhi raas rachaaye
Raadhaa ki paayal, Kanhe ki bansi
Amar raagon ko sunti gaati
Surili hai wah apni maati

Aaj wahi suraj, wahi gagan
Wahi koyal hai punah bulaati
Dil mein laakhon prashn liye
Arya putra ko hai lalkaarti
Geet shaurya ka gaate hue
Balidaanon ki yaad dilaati
Maha purushon ne dekha jo sapna
Wahi swapn hai punah dikhaati

Bahut kuchh hai paayaa, bahut kuchh hai paana
Lambe kathin is maarg pe; kahin tum thak na jaana
Marg kathin hai, dekho desh kahin dhatak na jaaye
Keechad se kali phooti hai, bin khile sookh na jaaye.

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खूनी हस्ताक्षर


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In memory of the great man who created an army to free his motherland…

The very famous (and one my favorite) poem by Gopal Prasad Vyas…

Happy Birthday… dear son of India…

वह खून कहो किस मतलब का
जिसमें उबाल का नाम नहीं।
वह खून कहो किस मतलब का
आ सके देश के काम नहीं।

वह खून कहो किस मतलब का
जिसमें जीवन, न रवानी है!
जो परवश होकर बहता है,
वह खून नहीं, पानी है!

उस दिन लोगों ने सही-सही
खून की कीमत पहचानी थी।
जिस दिन सुभाष ने बर्मा में
मॉंगी उनसे कुरबानी थी।

बोले, “स्वतंत्रता की खातिर
बलिदान तुम्हें करना होगा।
तुम बहुत जी चुके जग में,
लेकिन आगे मरना होगा।

आज़ादी के चरणें में जो,
जयमाल चढ़ाई जाएगी।
वह सुनो, तुम्हारे शीशों के
फूलों से गूँथी जाएगी।

आजादी का संग्राम कहीं
पैसे पर खेला जाता है?
यह शीश कटाने का सौदा
नंगे सर झेला जाता है”

यूँ कहते-कहते वक्ता की
आंखों में खून उतर आया!
मुख रक्त-वर्ण हो दमक उठा
दमकी उनकी रक्तिम काया!

आजानु-बाहु ऊँची करके,
वे बोले, “रक्त मुझे देना।
इसके बदले भारत की
आज़ादी तुम मुझसे लेना।”

हो गई सभा में उथल-पुथल,
सीने में दिल न समाते थे।
स्वर इनकलाब के नारों के
कोसों तक छाए जाते थे।

“हम देंगे-देंगे खून”
शब्द बस यही सुनाई देते थे।
रण में जाने को युवक खड़े
तैयार दिखाई देते थे।

बोले सुभाष, “इस तरह नहीं,
बातों से मतलब सरता है।
लो, यह कागज़, है कौन यहॉं
आकर हस्ताक्षर करता है?

इसको भरनेवाले जन को
सर्वस्व-समर्पण काना है।
अपना तन-मन-धन-जन-जीवन
माता को अर्पण करना है।

पर यह साधारण पत्र नहीं,
आज़ादी का परवाना है।
इस पर तुमको अपने तन का
कुछ उज्जवल रक्त गिराना है!

वह आगे आए जिसके तन में
खून भारतीय बहता हो।
वह आगे आए जो अपने को
हिंदुस्तानी कहता हो!

वह आगे आए, जो इस पर
खूनी हस्ताक्षर करता हो!
मैं कफ़न बढ़ाता हूँ, आए
जो इसको हँसकर लेता हो!”

सारी जनता हुंकार उठी-
हम आते हैं, हम आते हैं!
माता के चरणों में यह लो,
हम अपना रक्त चढाते हैं!

साहस से बढ़े युबक उस दिन,
देखा, बढ़ते ही आते थे!
चाकू-छुरी कटारियों से,
वे अपना रक्त गिराते थे!

फिर उस रक्त की स्याही में,
वे अपनी कलम डुबाते थे!
आज़ादी के परवाने पर
हस्ताक्षर करते जाते थे!

उस दिन तारों ने देखा था
हिंदुस्तानी विश्वास नया।
जब लिक्खा महा रणवीरों ने
ख़ूँ से अपना इतिहास नया।

Forget not the path O Traveler


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Today as we celebrate our 67th Independence Day, I could not resist recollecting a poem by Shiv Mangal Singh Suman. On this occasion let me attempt a translation of this inspiring poem…
(The poem in Hindi can be found here)

Forget not the path O Traveler
There will be thrones on the way
And so will be forests, rivers, streams
And mountains and gardens green
But in this mirage of beauty and charm
Forget not the path O Traveler

When on this stern treacherous way
The pedestrian would be desperate
When dreams are all wiped off
And the only way is to move ahead
Then depressed by your first failure
Forget not the path O Traveler

When even your dear ones turn back
And appear to to be strangers
And dark monstrous clouds of dejection
Surround you at each step
Then in this solitary phase of journey
Forget not the path O Traveler

On hearing the loud war cry
When soldiers would be marching ahead
When a few hearts would melt
And tears would urge you not to go
In this battle of love and duty
Forget not the path O Traveler

When a few heads are all that’s required
To complete the glorious garland of victory
When your mother cries out for sacrifice
For the never-ending flame of freedom
Not for a moment you do hesitate
Forget not the path O Traveler!

O my supreme mother! I am a traveler who wishes to lead you through the glorious path. Please bless my so that I never forget my path!

Happy Independence day to all! Let us all work together to make our motherland the land of our dreams…

The Silent National Anthem


Sometimes words are not required

Nostalgia…Impressions from the Past…Part 1


Cultural Diversity – National Integrity

Some Moments don’t die. This is one of them

आज फिर


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आज फिर वही दिन; फिर वही बात है

जज्बे और जूनून की अरमानों से मुलाकात है ।

आज फिर तिरंगा गर्व से हवा में लहराएगा

हर बच्चा प्रफुल्लित हो राष्ट्रगान फिर गाएगा।

फिर निकलेगी मतवालों की टोली; राजपथ मुस्काएगा;

कला संस्कृति के प्रदर्शन से हर राज्य आज इठलाएगा।

आज फिर बलखेगी अमर जवान याद कर परवानों को ;

होंगी आँखें फिर नम याद कर उन बलिदानों को।

पर फिर आएगी रात नए दिन का आगमन होगा

शहीदों की कुर्बानी का पुनः जब विस्मरण होगा।

दैनिक कोलाहल के बीच कहीं गौरवान्वित भारत खो जायेगा

आज का प्रगतिशील भारत मानवता को भुलायेगा।

फिर दब जाएगी वह करुण चीख गाड़ियों के शोर-शराबे में;

और इसी तरह फिर चढ़ेगी भेंट नारी पौरुष के उग्र प्रदर्शन में।

फिर भी विषाक्त होगी गंगा कल कारखानों के दूषण से;

फिर भी दौड़ेगी फाइलें यहाँ नोटों के ही पोषण से।

फिर भी लहराएगा तिरंगा; पर न उसमें गौरव होगा;

फिर भी गाएगी हवा यहाँ; पर उसका राग भैरव होगा।

समस्याएं होंगी अनगिनत; फिर भी हम उन्ही पे इतरायेंगे ;

गण होंगे पर तंत्र न होगा; फिर भी हम गणतांत्रिक कहलायेंगे।

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